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दुनिया में पहली बार लोग मनाने वाले हैं, नास्तिक दिवस- जानिये कब?

जी हाँ! नास्तिक दिवस। वैसे ही जैसे हम ‘महिला दिवस’ मनाते हैं अथवा ‘योग दिवस’ और ‘शिक्षा दिवस’ मनाते हैं। इससे पहले कि ‘नास्तिक दिवस’ के बारे में जाने अथवा कैलैंडर में तारीख मार्क कर लें; आईये बात करते हैं नास्तिकता के बारे में। ज्यादा नहीं, बस पांच मिनट।

नास्तिकों के लेकर समाज में तरह तरह की सोच रही है। किसी समाज में नास्तिकों को अनैतिक मानते हैं, तो किसी समाज में भटकाव; किसी समाज में उन्हें समाज के लिए ख़तरा माना जाता है, तो किसी समाज में व्यवस्था विरोधी। यह सिर्फ भारत और पाकिस्तान जैसे देशों की बात नहीं है, बल्कि दुनिया के अधिकांश देशों की सच्चाई है। 
ज्यादातर लोग आज भी इंसान बाद में पहले मुस्लिम, हिन्दू, ईसाई, पारसी, जैन, सिख, यहूदी आदि हैं। उनके लिए ऐसा इन्सान जो धर्मों की बात, ईश्वर अथवा उनके तथाकथित पवित्र ग्रंथों की बात नहीं मानता नास्तिक है।
सवाल है कि क्या नास्तिक अच्छे इंसान नहीं होते? क्या वे अनैतिक होते हैं? यदि हमें नास्तिकों के बारे में पता चल जाए, तो शायद हमारी गलतफहमी दूर हो जाये। नास्तिकता का बुरा होने से कोई सम्बन्ध नहीं है। जिस प्रकार किसी व्यक्ति के धर्म अथवा ईश्वर को मानने से उसका अच्छा बुरा होना तय नहीं होता, उसी प्रकार एक इन्सान के नास्तिक होने से नैतिक-अनैतिक होना तय नहीं होता।
गौतम बुद्ध भी तो नास्तिक थे, और हाल की बात करें तो महान वैज्ञानिक स्टीफन हाकिंग भी खुद को खुलेआम नास्तिक कहते थे। ऐसे लोगों की संख्या कम जरुर रही है, पर बेहतर इंसान साथ ही नास्तिक दुर्लभ भी नहीं हैं। नास्तिक होने मात्र से तो वे बुरे इन्सान नहीं हो गए अथवा अनैतिक हो नहीं हो गए। भारत में भी नास्तिकों की एक लम्बी सूची है, जिनके बारे में जानकार आपको आश्चर्य हो सकता है।
लेकिन लोगों की मान्यता है कि बदलने का नाम नहीं ले रही है। पाकिस्तान और कई मुस्लिम देशों में आज भी ईशनिन्दा जैसा कानून है। इस कानून के अन्तर्गत यदि कोई अल्लाह अथवा उनके ग्रन्थ के बारे में कुछ भी अलग विचार रखने, उसकी आलोचना करने आदि की जुर्रत करता है, तो उसे मृत्यु दंड तक दिया जा सकता है। ऐसे धर्म इन्सान को नास्तिक होने की आज़ादी नहीं देता। हालाँकि हमारा पडोसी देश चीन इसका अपवाद है, जहाँ नास्तिकता को बढ़ावा दिया जाता है।
नास्तिक होने के ऐसे में बड़े खतरे हैं। बांग्लादेश में नास्तिक ब्लॉग लिखने वालों के ऊपर हमले हो चुके हैं। भारत भी कोई अपवाद नहीं है। दाभोलकर, पानसरे, कलबुर्गी और गौरी लंकेश आदि पर हमले तथा उनकी हत्या को भी इसी प्रकार देखा जा सकता है।ऐसे में क्या किसी व्यक्ति को स्वतन्त्रतापूर्व बिना किसी को नुकसान पहुंचाये नास्तिक बन कर जीने का हक नहीं है? दूसरी तरफ धर्म को मानने वालों को, क्या खुलेआम सड़क को जाम कर, नदियों को प्रदूषित कर, देर रात लाऊड-स्पीकर पर शोर मचाकर भी अपने धर्म को मानने की स्वतंत्रता है?धर्म अथवा व्यक्ति का विश्वास बहुत व्यक्तिगत मामला है। ऐसे में या तो सभी लोगों को उसी प्रकार नास्तिक होने, नास्तिकता का व्यवहार करने की आज़ादी होनी चाहिए, जिसप्रकार धर्म विशेष को मानने वालों को है। फिर कोई विशेष धर्म हो कि नास्तिकता, वह व्यक्ति का निजी मामला होना चाहिए।पूरी दुनिया में नास्तिकों के अधिकारों, उसकी स्वतंत्र सोच, धर्म-विहीन मानवता आदि मूल्यों को मानने की विश्व में स्वीकार्यता हो, इसे लेकर प्रतिवर्ष ‘विश्व नास्तिक दिवस’ यानि ‘वर्ल्ड एथीस्ट डे’ मनाने की योजना कई नास्तिक संगठनों की है। तारिख तय हुई है 23 मार्च, 2019 का।संयोग से 23 मार्च भी वही दिन है जिसे हम शहीद दिवस के रूप में मनाते हैं। इसी दिन भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को1931 में फांसी की सजा हुई थी। आप जानते ही होंगे कि भगत सिंह भी नास्तिक थे। आपने उनका लेख तो पढ़ा ही होगा, जिसका शीर्षक है- मैं नास्तिक क्यों हूँ।वैश्विक रूप से पहली बार नास्तिक दिवस मनाने की तैयारी अभी से की जा रही है। ऐसे संगठनों में, जो इसकी वैश्विकघोषणा-पत्र जारी कर इसे बढ़ावा दे रहे हैं, प्रचार कर रहे हैं तथा सबको एकजुट व समन्वय का प्रयास कर रहे हैं। उनमें प्रमुख हैं– एथीस्ट रिपब्लिकएक्स-मुस्लिम्स ऑफ़ नार्थ अमेरिका,  मुस्लिमिशएक्स-मुस्लिम्स ऑफ़ ब्रिटेनएसोसिएशन डे अटीऑस डे बोगोटाएक्स-मुस्लिम्स ऑफ़ जॉर्डन,   फ्री हर्ट्स फ्री माइंडस आदि हैं।   इन संगठनों ने इसके लिए बाकायदा काउंट-डाउन शुरू कर दिया है और अपडेट के लिए आप भी खुद को साइन-अप कर सकते हैं। आप चाहें तो अपने शहर में भी नास्तिक दिवस काआयोजन कर सकते हैं अथवा उसमें शामिल हो सकते हैं। उनके द्वारा इसके लिए एक लोगो भी डिजाईन किया गया है, जो हरे रंग का सर्किल है। आप चाहें तो इस लोगो का इस्तेमाल कर नास्तिक दिवस मना सकते हैं। आप खुद नास्तिक  भी हों, तो अपने साथी नास्तिकों के अधिकार के लिए उनका साथ दे सकते हैं।आज फेसबुक और दुसरे सोशल मीडिया के दौर में, नास्तिकों के लिए वह दिन दूर नहीं, जब आप खुलकर सबके सामने अपनी नास्तिकता को इज़हार कर सकते हैं और कोई भी आपको इसके लिए अलग नज़रों से नहीं देखेगा।

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