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रामायण एक कल्पना ~ धर्ममुक्त

अकसर ज्ञानी और अज्ञानी मित्र यही बहस करते हैं कि रामायण महज एक कपोलकल्पित कवि की रचना है या हमारे देश का पुरातन इतिहास।
क्योंकि रामायण के साथ जुड़ी है सनातन वैदिक हिन्दू धर्म की आस्था वहीं बौद्ध धर्म के अनुयायी इस राम कथा पर प्रश्न चिन्ह लगाते हैं, इस तर्क वितर्क कुतर्क के खेल में भारत का आम जनमानस कठपुतली बन कर रह गया है।
कुछ ज्ञानी मित्र कहते हैं लुक ईस्ट ,
वहाँ कई रामायण से संबंधित प्रमाण मौजूद हैं तो मित्रों चलते हैं हम भी रामायण की सत्यता खोजने,
सबसे पहले हम पूरब से ही निबट लेते हैं भारत के पूरब में सियाम देश स्थित हैं जिनमें लाओस, कंबोडिया, मलेशिया, मयांमार और थाइलैंड आते हैं वैसे थाइलैंड को ही मुख्य श्यामदेश (सियाम देश) कहा जाता है।
{{{ आज के थाई भू भाग में मानव पिछले कोई १०,००० वर्षों से रह रहें हैं। ख्मेर साम्राज्य के पतन के पहले यहाँ कई राज्य थे – ताई, मलय, ख्मेर इत्यादि। सन् १२३८ में सुखोथाई राज्य की स्थापना हुई जिसे पहला बौद्ध थाई (स्याम) राज्य माना जाता है। लगभग एक सदी बाद अयुध्या के राज्य ने सुखाथाई के ऊपर अपनी प्रभुता स्थापित कर ली। सन् १७६७ में अयुध्या के पतन (बर्मा द्वारा) के बाद थोम्बुरी राजधानी बनी। सन् १७८२ में बैंकॉक में चक्री राजवंश की स्थापना हुई जिसे आधुनिक थाईलैँड का आरंभ माना जाता है।
प्राचीन समय में यह एक पूर्णतया हिन्दू संस्कृति को मानने वाला देश था किन्तु 2000 साल पहले यहाँ बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार शुरू हुआ| लगभग इस देश के सभी लोगों ने बौद्ध धर्म स्वीकार लिया| किन्तु हिन्दू संस्कृति आज भी यहाँ विद्यमान है|
एक स्वतंत्र राज्य के रुप में थाईलैंड के अस्तित्व में आने के पहले ही इस क्षेत्र में रामायणीय संस्कृति विकसित हो गई थी। अधिकतर थाईवासी परंपरागत रुप से राम कथा से सुपरिचित थे। १२३८ई. में स्वतंत्र थाई राष्ट्र की स्थापना हुई। उस समय उसका नाम स्याम था। ऐसा अनुमान किया जाता है कि तेरहवीं शताब्दी में राम वहाँ की जनता के नायक के रुप में प्रतिष्ठित हो गये थे, किंतु राम कथा पर आधारित सुविकसित साहित्य अठारहवीं शताब्दी में ही उपलब्ध होता है।
 राजा बोरोमकोत (१७३२-५८ई.) के रजत्व काल की रचनाओं में राम कथा के पात्रों तथा घटनाओं का उल्लेख हुआ है। परवर्ती काल में जब तासकिन (१७६७-८२ई.) थोनबुरी के सम्राट बने, तब उन्होंने थाई भाषा में रामायण को छंदोबद्ध किया जिसके चार खंडों में २०१२ पद हैं। पुन: सम्राट राम प्रथम (१७८२-१८०९ई.) ने अनेक कवियों के सहयोग से जिस रामायण की रचना करवाई उसमें ५०१८८ पद हैं। यही थाई भाषा का पूर्ण रामायण है।३ यह विशाल रचना नाटक के लिए उपयुक्त नहीं थी। इसलिए राम द्वितीय (१८०९-२४ई.) ने एक संक्षिप्त रामायण की रचना की जिसमें १४३०० पद हैं। तदुपरांत राम चतुर्थ ने स्वयं पद्य में रामायण की रचना की जिसमें १६६४ पद हैं।४ इसके अतिरिक्त थाईलैंड में राम कथा पर आधारित अनेक कृतियाँ हैं। (उपरोक्त जानकारी इंटरनेट के माध्यम से ली गई है) }}}
लो मित्रों थाइलैंड की रामायण (रामकियेन) सन १२३८ में जाकर दम तोड़ देती है, इसका अर्थ ये हुआ कि लुक ईस्ट का नारा लगाने वाले अभी भी भ्रम में जी रहे हैं, चलो सबका भ्रम दूर करते हैं मित्रों।
रामायण को पढ़ते समय उत्तर कांड में अयोध्या नरेश अनरणय का प्रसंग आया जिन्हें लंका नरेश रावण युद्ध के लिए ललकारता है बस यहीं से जल गई धर्ममुक्त के दिमाग की बत्ती।
लग गए पता लगाने आखिर ये अनरणय है कौन ? हमने तो रघुवंशी दशरथ का नाम सुना था, तो मित्रों अनरणय इक्ष्वाकु वंश के २८ वें राजा होते हैं जिनसे रावण युद्ध करता है  फिर वही रावण अयोध्या नरेश अनरणय के ३२ वें वंशज राजा दशरथ (द्वितीय) के पुत्र राम से युद्ध करता है तो बताओ रावण कितने बरस जिंदा रहा ?
जबकि रामायण के अनुसार राजा दशरथ भी दस हजार साल राज करके मृत्यु को प्राप्त हुए!
लगा ना जोर का झटका ?
थोड़ा हृदय गति को नियंत्रित रखो मित्रों अभी तो दो झटके बाकी हैं।
अब आते हैं भारत के इतिहास पर,
तो मित्रों  भारत का इतिहास 700 ईसा पूर्व से सतत और प्रमाणिक माना जाता है तो हम पहुंचते हैं दशरथ (द्वितीय) के पूर्व के राजा रघु के शासन काल में, जिनसे रघुवंश की स्थापना हुई, उनका शासन काल 1000-364 ईसा पूर्व का माना जाता है, रघुवंश के शासन काल के मध्य में ही बुद्ध और महावीर का जन्म (563-384 ईसा पूर्व) हुआ होगा, परंतु बौद्ध और जैन साहित्य में राजा राम का शासन काल नदारद है, फिर तो रामायण की सत्यता पर सीधा सूर्य ग्रहण लगता है मित्रों ?
आखिर भक्तों के भगवान राजा राम विलुप्त कहाँ हो गए ?
रामायण और महाभारत के बारे में कहा जाता है कि दोनों ग्रंथों की रचना  400 ईसा पूर्व हुई , फिर भी ये सनातन धर्म के अनुयायी इन ग्रंथों को आदिकाल से जोड़ते हैं जबकि महाभारत का अंतिम पर्व अर्थात हरिवंश पर्व खुद शुंगवंश के शासक पुष्यमित्र शुंग की प्रशंसा करके महाभारत को 185-149 ईसा पूर्व के बाद का साबित करता है,
लगे ना जोर के झटके जोर से ?
अब बताओ मित्रों, रामायण को हम किस आधार पर सत्य मानें ?
उपरोक्त तथ्यों के आधार पर यही कहा जा सकता है कि रामायण एक काल्पनिक ग्रंथ है परंतु भक्तों ने उसके आधार पर मंदिरों, कथाओं, भजनों, शहरों और नदियों के नाम बदलकर वास्तविक साबित करने की कोशिश की है!
मैं भी धर्म ग्रंथों से ही आपकी बुद्धि खोलने का प्रयास करता हूँ कहीं कहीं पात्रों घटनाओं को सत्य बताकर आपकी आस्था को खंडित करता हूँ जिससे आपके अंतर्मन को हिला सकूँ, आपको वास्तविक बना सकूँ!
जय #धर्ममुक्त #dharmamukt
© Kashmir Singh Sagar Dharmamukt

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