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कुंभ सफाई कर्मचारी:सन्मान के साथ रोजगार भी चाहिए,सरकार विरोधाभासी

प्रयाग, उत्तर प्रदेश

कुंभ में दिन रात मेहनत का फल मिला। प्रधानमंत्री ने पैर धोए और सम्मानित कर काम को सराहा भी लेकिन, उनके जाने के साथ ही सम्मान एवं सभी के बीच छाए रहने का दौर खत्म हो गया। रविवार शाम से ही रोजगार की चिंता सताने लगी। कल यह नौकरी होगी, इसकी भी कोई गारंटी नहीं है। यह दर्द है कुंभ में दिहाड़ी पर नियुक्त सफाईकर्मियों और स्वच्छग्रहियों का। उनका कहना था, ‘सम्मान ही काफी नहीं है, स्थायी रोजगार भी चाहिए। हमें यह काम ही हमेशा करने दिया जाए। प्रधानमंत्री से यही उम्मीद और मांग है।’

प्रधानमंत्री के हाथों सम्मानित होने वालीं शीतल की कुंभ के दौरान सफाई के लिए नियुक्ति हुई हैं। अपनी पीड़ा बयां करते हुए शीतल भावुक हो गईं और  आखें भर आईं। लड़खड़ाते आवाज में उन्होंने बताया, ‘रोजाना 310 रुपये मिलते हैं। प्रधानमंत्री के हाथों सम्मान मिला। यह गौरव की बात है लेकिन सम्मान से पेट तो नहीं भरा जा सकता। कुंभ के बाद नौकरी की चिंता शुरू हो जाएगी। 

सुमन ने भी कुछ इसी तरह का दर्द बयां किया। उनका कहना था कि हमें हमारा यही काम हमेशा के लिए दे दिया जाए। सफाई व्यवस्था पर निगरानी के लिए नियुक्त सोनू को रोजाना पांच सौ रुपये मिलते हैं। सोनू का भी कहना था कि ‘प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री नियमित मानदेय पर भी हमें रखे जाने की घोषणा कर देते तो अच्छा होता।’

प्रधानमंत्री के इस कार्य के बाद सोशल मीडिया में भी मिली जुली प्रतिक्रिया आने लगी है।

कोई इसे सामाजिक बदलाव मान रहा है तो कोई इसे प्रधानमंत्री की महानता मान रहा है।

पर बहुत हद तक लोग इसे एक चुनावी स्टंट के तौर पर देख रहे है।जबसे समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का गठबंधन बना हुआ है तब से भारतीय जनता पार्टी पिछड़े और दलितों में अपनी जगह तलाश रही है।यही एक वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब सफाई कर्मचारियों के पैर धोते नजर आए।

अगर देखा जाए तो सफाई कर्मचारियों के हक़ की आवाज उठानेवाले अंशु मालवीय को योगी आदित्यनाथ सरकार ने कुछ दिन पूर्व जेल दिखा दी थी।

सीवर में उतरनेवाले कर्मचारीयों के पुनर्वास के लिए नरेंद्र मोदी सरकार ने एक रुपये का भी बजट पिछले 5 सालों में आबंटित नही किया है।यह अजीब विरोधाभास कथनी और करनी में देखा जा सकता है।

यही वजह है कि सोशल मीडिया पर लोगो का विरोध भी दिखाई दे रहा है।

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